अब अरावली पर कब्ज़ा किया तो सीधा एक्शन!

अरावली में अवैध फार्म हाउस, गैर-वानिकी कार्य और पहाड़ों पर कब्ज़े का सिलसिला अब रुक सकता है। प्रदेश सरकार ने पहली बार साफ-साफ तय कर दिया है कि किस इलाके की निगरानी किस विभाग की होगी — और बहानेबाज़ी की कोई गुंजाइश नहीं रहेगी।

गैर-मुमकिन पहाड़ वाले क्षेत्रों की जिम्मेदारी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को दी गई है, जबकि घोषित वन भूमि की निगरानी वन विभाग करेगा। इसके अलावा नगर परिषद सोहना, नगर निगम गुरुग्राम और नगर निगम मानेसर भी अपने-अपने क्षेत्र में जवाबदेह होंगे।

अब कार्रवाई में नहीं लगेगा तालमेल का जंजाल
पहले अवैध निर्माण गिराने या गैर-वानिकी कार्य रोकने के लिए कई विभागों के बीच तालमेल बैठाना पड़ता था, जिससे कार्रवाई धीमी हो जाती थी। अब सीधा जिम्मेदार विभाग ही एक्शन लेगा। सरकार का मानना है कि इससे अवैध फार्म हाउस और निर्माण तोड़ने की रफ्तार बढ़ेगी।

1992 से कानून, लेकिन नियम की उड़ती रही धज्जियां
7 मई 1992 की अधिसूचना के मुताबिक अरावली पहाड़ी क्षेत्र में किसी भी गैर-वानिकी कार्य से पहले केंद्र सरकार से अनुमति अनिवार्य है। लेकिन हकीकत यह है कि बिना अनुमति के हजारों कार्य हो चुके हैं—सैकड़ों फार्म हाउस, अवैध सड़कें और रास्ते तक बना दिए गए।

90 फार्म हाउसों पर नोटिस, पर कार्रवाई ठप
वन विभाग ने 90 अवैध फार्म हाउसों को नोटिस जारी किए 15 दिन से ज्यादा हो गए, लेकिन बुलडोज़र अभी तक नहीं चला। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब सुप्रीम कोर्ट या एनजीटी की सुनवाई होती है, तभी दिखावे की कार्रवाई होती है—एक-दो दीवारें तोड़कर रिपोर्ट लगा दी जाती है।

“जिम्मेदारी तय, अब बहाना नहीं” – पर्यावरण कार्यकर्ता
कृष्णा अरावली फाउंडेशन के अध्यक्ष प्रो. केके यादव ने कहा, “अरावली की सुरक्षा पूरे प्रशासन की जिम्मेदारी है। अब जब विभागवार जिम्मेदारी तय हो गई है, तो बहानेबाज़ी की गुंजाइश नहीं। असली परीक्षा तब होगी जब कागज़ी कार्रवाई की जगह जमीन पर ईमानदारी से एक्शन होगा।”

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