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दो साल की नाकामी के बाद भी… नगर निगम फिर वही एजेंसियां चुनने को तैयार !

गुरुग्राम नगर निगम की उन सफाई एजेंसियों ने जिन्होंने पिछले दो साल में शहर की स्वच्छता को लेकर लगातार नाकामी दिखाई और शहर की छवि को विश्व स्तर पर प्रभावित किया, अब उनकी कार्य अवधि छह महीने और बढ़ाने की तैयारी चल रही है। एक्सटेंशन की फाइल पहले ही चंडीगढ़ मुख्यालय भेज दी गई है और बस सरकारी मुहर का इंतजार है।

टेंडर प्रक्रिया क्यों रुकी?
नगर निगम के अधिकारियों ने नई टेंडर प्रक्रिया शुरू नहीं की, जबकि मौजूदा टेंडर की अवधि खत्म नहीं हुई थी। दो साल पहले निगम ने छह निजी एजेंसियों को शहर की सफाई का जिम्मा सौंपा था। इन एजेंसियों के पास न तो पर्याप्त मैनपावर था और न ही मशीनरी, जिसके कारण शहर “कूड़ाग्राम” बन गया।

नगरवासियों का जनजीवन प्रभावित
पूरा मानसून सीजन कूड़े की दुर्गंध और ढेरों के कारण मुश्किल भरा रहा। कई विदेशी पर्यटकों ने शहर की सफाई का हाल सोशल मीडिया पर साझा किया। पॉश इलाके भी इससे अछूते नहीं रहे और सफाई की कमी ने बड़े सवाल खड़े कर दिए।

फिर भी एजेंसियों को मिल रहा काम
इसके बावजूद, नगर निगम इन एजेंसियों को दोबारा छह महीने के लिए काम सौंपने की तैयारी कर रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि निगम को ऐसी एजेंसियों को काम देना चाहिए जो वास्तव में शहर की स्वच्छता सुनिश्चित करें।

पिछले दो सालों का रिकॉर्ड

  • शहर की सफाई का जिम्मा इन एजेंसियों — भारती, आर्मी डेकोरेटर्स, वाइएलवी एसोसिएट्स, सुखमा एंड संस और केएस मल्टीफेसिलिटी — के पास है।
  • करोड़ों रुपये भुगतान के बावजूद सफाई व्यवस्था बार-बार सवालों के घेरे में रही।
  • काम में लापरवाही के कारण इन एजेंसियों पर लाखों रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।

अधिकारियों का जवाब
नगर निगम के एक्सईएन सुंदर श्योराण का कहना है कि नई टेंडर प्रक्रिया पूरी होने में समय लगेगा, ऐसे में फिलहाल इन्हीं एजेंसियों से काम चलाना मजबूरी है। एक्सटेंशन के लिए पत्र मुख्यालय को भेजा जा चुका है।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • गुरुग्राम में प्रतिदिन 1,200 टन कूड़ा उत्पन्न होता है।
  • 900-1,000 टन कूड़ा फरीदाबाद से बंधवाड़ी भेजा जा रहा है।
  • शहर में 10 से अधिक एजेंसियां सफाई कार्य में लगी हैं।
  • 250 से ज्यादा गारबेज वर्नेबल प्वाइंट बनाए गए हैं।
  • पिछले साल एक लाख से ज्यादा स्वयंसेवकों ने सिर्फ सात घंटे में शहर को स्वच्छ किया।

नगर निगम की प्राइवेट एजेंसियां पूरे साल में शहर को स्वच्छ नहीं रख सकीं, जबकि स्वयंसेवक और स्थानीय अभियान शहर को चमका सकते हैं। अब सवाल उठता है कि क्या निगम इस बार जिम्मेदार एजेंसियों के चयन पर ध्यान देगा, या शहर फिर “कूड़ाग्राम” बनता रहेगा।


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