गुरुग्राम में टेल्मा-एएम और गुजरात में निकार्डिया रिटार्ड-10 की संदिग्ध नकली दवाएं मिलने के बाद जांच का दायरा बढ़ता जा रहा है। दोनों मामलों में फिलहाल कोई सीधा संबंध सामने नहीं आया है, लेकिन जिस तरह असली कंपनियों के नाम, बैच और पैकेजिंग का इस्तेमाल कर दवाएं बाजार तक पहुंचाई गईं, उसने जांच एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। गुरुग्राम से शुरू हुई नकली BP दवा की जांच अब सिर्फ एक मेडिकल स्टोर या एक सप्लाई चैन तक सीमित नहीं रह गई है। जांच की कड़ियां कई शहरों और राज्यों तक पहुंच चुकी हैं। इसी बीच गुजरात में भी BP की संदिग्ध नकली दवा का एक अलग मामला सामने आया है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है क्या ये दोनों अलग-अलग नकली दवा नेटवर्क हैं या इनके पीछे कहीं कोई साझा सप्लायर, पैकेजिंग या कच्चे माल की कड़ी छिपी है? फिलहाल जांच एजेंसियों को दोनों मामलों के बीच कोई सीधा संबंध नहीं मिला है। हालांकि, दोनों मामलों में सामने आए पैटर्न ने जांच का दायरा जरूर बढ़ा दिया है।

गुरुग्राम में कैसे खुला नकली BP दवा का मामला?
गुरुग्राम में जुलाई में सुभाष नगर स्थित एक मेडिकल स्टोर से टेल्मा-एएम की संदिग्ध दवा मिलने के बाद एफडीए ने जांच शुरू की। जांच आगे बढ़ी तो 19 जुलाई को सुब्रत द्विवेदी को गिरफ्तार किया गया। इसके अगले दिन मुरादाबाद निवासी जुबैर की गिरफ्तारी हुई। जांच की कड़ी इसके बाद दिल्ली तक पहुंची। सितंबर में जांच एजेंसियों ने रुड़की निवासी विपिन कुमार और काशीपुर निवासी प्रदीप कुमार को गिरफ्तार किया। जांच में करीब 90 हजार गोलियां बनाए जाने की जानकारी सामने आई। इसके बाद कंपनी के निदेशक मनीष सिंह राठौर को भी गिरफ्तार किया गया।
अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि दवा बनाने के लिए कच्चा माल कहां से आया, पैकेजिंग कहां तैयार हुई, नकली लेबल कैसे बनाए गए और तैयार दवाओं को अलग-अलग बाजारों तक कैसे पहुंचाया गया।
गुजरात में भी सामने आया दूसरा नेटवर्क
इसी तरह गुजरात में निकार्डिया रिटार्ड-10 की संदिग्ध नकली दवा मिलने के बाद एक अलग जांच शुरू हुई। कंपनी की शिकायत के बाद गुजरात की स्थानीय एजेंसी एफडीसीए ने मामले की जांच शुरू की। जांच के दौरान अहमदाबाद से तीन आरोपितों की गिरफ्तारी हुई। इसके बाद जांच की कड़ी उत्तराखंड, राजस्थान और उत्तर प्रदेश तक पहुंचने की बात सामने आई है। यानी एक तरफ गुरुग्राम मामले की जांच कई राज्यों तक पहुंच चुकी है, वहीं गुजरात के मामले में भी अलग-अलग राज्यों से कड़ियां जुड़ती दिखाई दे रही हैं।
असली कंपनी के नाम का इस्तेमाल, फिर भी नकली दवा?
दोनों मामलों में जांच का एक अहम पहलू यह है कि संदिग्ध दवाओं को बाजार तक पहुंचाने के लिए असली कंपनी के नाम, बैच और पैकेजिंग जैसी चीजों का इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है। यही वजह है कि अब जांच सिर्फ दवा बनाने वालों तक सीमित नहीं है। एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि
* कच्चा माल कौन उपलब्ध करा रहा था?
* नकली पैकेजिंग और लेबल कहां तैयार हुए?
* दवाएं किस चैनल से बाजार तक पहुंचीं?
* किन शहरों और राज्यों में इनकी सप्लाई हुई?
* क्या कोई साझा सप्लायर दोनों मामलों से जुड़ा है?
क्या गुरुग्राम और गुजरात मामले की कोई कड़ी है?
अभी तक दोनों मामलों के बीच सीधा संबंध सामने नहीं आया है। लेकिन जांच एजेंसियों के लिए सबसे अहम सवाल यही है कि क्या दोनों मामलों में इस्तेमाल हुए कच्चे माल, पैकेजिंग सामग्री, लेबल या सप्लाई चैन में कहीं कोई समानता मिलती है। अगर जांच में किसी साझा सप्लायर या पैकेजिंग स्रोत का पता चलता है, तो नकली BP दवा का यह मामला कई राज्यों तक फैले एक बड़े नेटवर्क की दिशा में जा सकता है। फिलहाल यह सिर्फ जांच का विषय है और दोनों मामलों को अलग-अलग जांचा जा रहा है।
अब आगे क्या होगा?
गुरुग्राम में एफडीए अब नकली दवा की पूरी सप्लाई चेन को खंगाल रहा है। जांच का फोकस सिर्फ यह पता लगाने पर नहीं है कि दवा किसने बनाई, बल्कि कच्चे माल से लेकर पैकेजिंग और मेडिकल स्टोर तक पहुंचने की पूरी कड़ी सामने लाने पर है। दूसरी तरफ गुजरात मामले में भी जांच अलग-अलग राज्यों तक पहुंचने की बात सामने आई है। ऐसे में आने वाले दिनों में जांच से यह साफ हो सकता है कि ये दो अलग-अलग नेटवर्क हैं या नकली BP दवाओं के पीछे कहीं कोई साझा सप्लाई चैन काम कर रही थी।
