सोचिए, एक ही सड़क छह बार धंस जाए, उसकी मरम्मत पर 3 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हो जाएं और फिर भी समस्या खत्म न हो! अब सातवीं बार वही सड़क फिर धंस गई है। सवाल सिर्फ सड़क की गुणवत्ता का नहीं, बल्कि सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली और जनता के पैसे के इस्तेमाल का भी है।
गुरुग्राम-सोहना हाईवे पर सोहना चौक के नजदीक सोमवार को एक बार फिर सड़क धंसने से एनएचएआई और जीएमडीए की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आ गई है। गड्ढा बनने के बाद बैरिकेडिंग लगाकर एक लेन में यातायात बंद कर दिया गया है। इससे हाईवे पर वाहनों की आवाजाही भी प्रभावित हो रही है।

छह बार मरम्मत, 3 करोड़ खर्च… फिर भी नहीं सुधरी सड़क!
हैरानी की बात यह है कि इस जगह पर पहले भी छह बार सड़क धंस चुकी है। हर बार मरम्मत के नाम पर 3 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल पाया। अब सातवीं बार सड़क धंसने के बाद अधिकारी फिर से स्थायी समाधान का दावा कर रहे हैं। इस बार इसके लिए 2 करोड़ रुपये से अधिक खर्च होने का अनुमान है।
अब 120 मीटर सीवर लाइन होगी शिफ्ट
एनएचएआई के परियोजना निदेशक योगेश तिलक के मुताबिक, हाईवे के नीचे से गुजर रही करीब 120 मीटर लंबी सीवर लाइन को हटाकर सर्विस लेन पर शिफ्ट किया जाएगा। अधिकारियों का मानना है कि सीवर लाइन को शिफ्ट करने से सड़क धंसने की समस्या का स्थायी समाधान हो सकेगा।
लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सीवर लाइन ही समस्या की जड़ थी, तो पिछली छह बार की मरम्मत में इसे शिफ्ट क्यों नहीं किया गया? तीन महीने में फिर धंसी सड़क, अधिकारियों से जवाब मांगने पर चुप्पी! रिपोर्ट के मुताबिक, पिछली बार भी एनएचएआई की ओर से स्थायी समाधान का दावा किया गया था। उस समय भी जीएमडीए के सीईओ पीसी मीणा और एनएचएआई के परियोजना निदेशक योगेश तिलक ही जिम्मेदारी संभाल रहे थे।
लेकिन उस दावे के करीब तीन महीने बाद ही सड़क फिर धंस गई।
जब एनएचएआई के परियोजना निदेशक से पूछा गया कि पिछली बार ही सीवर लाइन को शिफ्ट क्यों नहीं किया गया, तो उनके पास इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं था।
अगर गड्ढे में गिर जाता कोई वाहन तो जिम्मेदार कौन होता?
सातवीं बार सड़क धंसने की घटना ने लोगों की सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अगर अचानक बने इस गड्ढे में कोई तेज रफ्तार वाहन गिर जाता और बड़ा हादसा हो जाता, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेता? सेक्टर-40 निवासी रमेश कुमार और नवीन वर्मा का कहना है कि जब तक जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसी घटनाओं पर रोक लगाना मुश्किल है।
अब जनता पूछ रही है सवाल
छह बार मरम्मत पर 3 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हो चुके हैं और अब सातवीं बार 2 करोड़ रुपये से अधिक खर्च करने की तैयारी है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि आखिर जनता के पैसे से कब तक सिर्फ मरम्मत होती रहेगी? क्या इस बार सीवर लाइन शिफ्ट होने के बाद सड़क धंसने की समस्या खत्म होगी या कुछ महीनों बाद फिर वही तस्वीर देखने को मिलेगी?
